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सूना

ओ री सखी,

ये कैसा फागुन है ?

वो हमको पहचान ना सके,

मैला समझ, अंगारों से भिगोया

दूजा समझ, एक नज़र भी ना सींचा

अंखिया क्या, आवाज़ भी झटक दी…..

फागुन उनका भी फ़ीका,

आंगन उनका भी सूना,

मगर चमक है आंखों में तिरंगे की।

मारे पकवानों के बीच,

फ़िकी सी जीभ है।

भरे रंगों के बीच,

बेरंगा सा मन है ।।

Book Review

“The Last Lecture” Book Review_01

Starting a new category here with my all time favourite book “The Last Lecture by Randy Pausch”.

Randy Pausch, A Computer Scientist and a Professor who is invited to give the last lecture as a customary of the Carnegie University. He, A man with dreams & fortunate to live most of them in reality too. This book is all about his last lecture which unfortunately turned out to be his life’s last lecture due to diagnosis of the terminal cancer which allowed him to live for hardly few months leaving behind a loving wife and two kids below the age of 6.

Book Genre: Non Fiction

“THE ONLY WAY ANY OF US CAN IMPROVE IS IF WE DEVELOP A REAL ABILITY TO ASSESS OURSELVES”

This is more strong & special book because he decided to turn his lecture into book for his kids after being aware of his very short life span. He wanted to let his children know him by his words rather than imaginations & stories told by others. As he knew he will not to be able to see them growing and they won’t be able to remember his talks at this tender age, so he gave lecture as he is communicating with them in different phases and ups & downs of life. It’s not only about teachings, it also talks about his own childhood dreams & how all of them turned into living reality. If not much, you will surely have something to take away with you with every reading and which will leave an imprint on you.

Language is easy to understand. Messages are conveyed in an apt way. Suggestion is to read with an ease, slowly incorporating.

Following are few lines/messages from the book which I found worth sharing :

  1. When you are screwing up and nobody says anything to you anymore, that means they’ve given up on you.
  2. When we send our kids to play organised sports: for most of us it’s not because we’re desperate for them to learn the intricacies of the sport. What we really want them to learn is far more important: teamwork, preseverance, sportsmanship, the value of hard work, an ability to deal with adversity.
  3. Time is all you have. And you may find one day that you have less than you think.
  4. If you wait long enough, people will surprise & impress you. If you are frustrated and angry with people, it’s just because you haven’t given them enough time.

Poetry

A feel

Memories hurt, badly
when its good.
You want to hold back, but its over
You want to come out, but its slough.

At times you are just a thing
lying here and there
picked at one moment
and thrown at the other.

You don't realize whether you
value or not
You are carried away, moved away
even with the most familiar breath.

You don't intend to hurt,
but you do.
You don't think bad,
but you do.

You miss your inner silence,
You miss your immediate smile,
you miss the love,
you miss the care,
what you don't miss is the loneliness.

What is with you is
your shaky confidence, trembled lips, wavy limbs
and foggy views.

It's just time, that changes
which moves on with the shiny world
which don't care you fall or break.

It's only YOU,
who decide
Your Place, Pace & Space.

aparnamishra
कविता · दिल से

बारिश, रात और हम


देर रात खिड़की के कोने पर बैठ के एक अजीब सा रिश्ता बुन रही हूँ……

किसका ??

इस अंधियारी रात, तड़पती बारिश और गुमनाम सी मैं का ।।

क्यों हर रात मेरे साथ जागती है उगते सूरज के आने तक ?
क्यों बादल यूँ बिलख के बरसते हैं मेरे अंदर से भीग जाने पर?
क्यों मैं, मुझसे ज्यादा खोई हूँ इन बूंदों भरी रात में ?

जहाँ चाँद भी घबराया सा गुम है……
जहाँ बादलों से चीख आती है तुम्हारे तड़पते दिल की….
जहाँ गिरते बूंद तुम्हारा मौन तोड़ रहे हैं मेरे रूह में…..
जहाँ ये मिट्टी की खुशबू मुझे बस रोक देती है….
जहाँ ये बारिश बिन छुए मुझे छिन्छोर देती है….

हाँ ……
ये रात, ये बारिश ही तो हैं ….
जिनके होने से मेरी सांसें कुछ और बढ़ जाती हैं,
जो मेरे होने में तेरी खुशबू को मिलाती हैं।

बैठी हूँ आज भी…..
बस उम्मीद लिए एक दिन तुम्हारे आ जाने की,
तुम्हारे साथ रात में कभी चांद के किस्से तो कभी बारिश की कहानी गुनगुनाने की ।।

© aparnamishra
कविता · दिल से

दलदल

तुम्हारी आखों में उम्मीद दिखी थी,

एक साथ, एक विश्वास दिखा था,

झूठ और अंधकार में रोशनी दिखी थी,

दोषी होने के दलदल का सहारा दिखा था।

मगर मैं भूल बैठी……

कि दलदल ले ही डूबता है,

निकलना चाहो तो और धस जाओगे,

जितना फङफङाओ, उलझ ही जाओगे,

लगी गन्दगी तन से मिटा न पाओगे,

उम्मीद साथ कब छोड़ दे, समझ ना पाओगे।

नादान थी……

जो सोच बैठी बीता कल बीत जाता है,

ये काला हो तो हर पल जलाता है,

भूल तुम बढ़ना भी चाहो,

फिसलन से तुमको गिराता है।

समझती हूँ…..

तुम्हारे टूटे दिल के लिए,

आसान नहीं अपना लेना धब्बों के संग,

जब ख्वाब में श्वेत चुनरी थी,

आसान नहीं अब प्यार भी,

जब कल्पना कोई और थी ।।

© aparnamishra

दिल से

कलम

मैं….

आज आज़ाद हूँ। कुछ कहने के लिए और चंद सांसें सुकून के लेने के लिए !!

आज़ादी इतना अलग अनुभव देती है, मुझे आज अहसास हुआ….. जब हाथ वही हैं और बोल मेरे ।।

मैं…… मैं एक कलम हूँ (पेन, आजकल प्रयोग होने वाला मेरा नया सा नाम) जो हर वक्त दूसरे की मर्ज़ी या मजबूरी से चलती हूँ ।

मगर आज….. कुछ अलग है !!

आज मैं खुद की खुशी से चल रही हूँ और इस स्वछन्दता से जी रही हूँ । आज अपनी हर भावना को बोल देना चाहती हूँ ….. लेकिन आज लगा कि ये आज़ादी मेरे शब्दों और विचारों को जैसे बांध रही हो, पर मैं मुक्त होना चाहती हूँ….. इस बंधन से ।

आज जिस हाथ ने मुझे थामा है, उसने भी सोचा होगा कि आज शब्दों से हंसी, गम या यूँ ही बीत रहे लम्हों का समावेश किया जायेगा….. कुछ ख्वाब बुने जायेंगें और फिर उन्हीं ख्वाबों को सिरहाने रख कर एक लम्बी खामोश सैर ली जाएगी ।।

ये इन्सान भी अजीब है……

अजीब ये याद आया ये मुझे कहीं रख के भूल भी जाते हैं…. और कभी कभी तो मुझे प्रेम के इज़हार का ज़रिया बना देते हैं। कभी कभी तो गुस्से में मेरी अंगुली (निब) तक मरोड़ दी……. मैं तो बस उन सब के भाव का ज़रिया मात्र रह गयी ।।

मेरा तो दम घुटता है बंद डब्बे में पड़े-पड़े…..

लेकिन तुम, मुझे कहीं रख कर अक्सर भूल ही जाती हो पर मैंने याद रखा तुम्हें अपनी आज़ादी में ।।

तुम्हें पता है ?

मैं भी थक जाती हूँ मेज़ पर लम्बे समय तक लेटे हुए, किताबों के सिरहाने लेटे लेटे कुछ किस्से मुझे भी याद से हो गये हैं । थोड़ी ऊब गयी हूँ…. अपने जैसे कुछ एक दो के साथ खड़े-खड़े ।

तुम्हे पता है कमीज़ की जेब से झांकते वक्त लुका-छुपी का खेल याद आता है लेकिन इस खेल में हम सिर्फ़ छुप कर के रह जाते हैं और जेब से बाहर आने का अवसर तब मिलता है जब हम खेल के बारे में सोच भी ना पायें ।

मैं आज बस अपनी परेशानी बताने के लिए नहीं पुकार रही…. मुझे गर्व है इस बात का कि हर दिल और दिमाग के विचारों की अभिव्यक्ति में मैं सहायक हूँ और शायद मेरी अहम भूमिका भी हैै।

हर एक एहसास के सहारे वर्तमान में होता हुआ भविष्य का सूचक हूँ मैं ।।

कविता

आसमां

देखते तुमको अरसा हुआ,

बड़े उखड़े हुए जला रहे थे,

थोङी छाँव मांगी,

तो धूप बरसा दिया ……

हुआ है क्या

बेचैन यूँ, भटके से है

कुछ तलाश है ?

सदमें में हो ?

दर्द क्या उभरा दिखा ?

अकड़न तोड़ के तुम आज,

मचल के यूँ गिरे हो,

शामें छोड़ के आज,

मुझसे यूँ मिले हो ।

© aparnamishra