कविता · दिल से

दलदल

तुम्हारी आखों में उम्मीद दिखी थी,

एक साथ, एक विश्वास दिखा था,

झूठ और अंधकार में रोशनी दिखी थी,

दोषी होने के दलदल का सहारा दिखा था।

मगर मैं भूल बैठी……

कि दलदल ले ही डूबता है,

निकलना चाहो तो और धस जाओगे,

जितना फङफङाओ, उलझ ही जाओगे,

लगी गन्दगी तन से मिटा न पाओगे,

उम्मीद साथ कब छोड़ दे, समझ ना पाओगे।

नादान थी……

जो सोच बैठी बीता कल बीत जाता है,

ये काला हो तो हर पल जलाता है,

भूल तुम बढ़ना भी चाहो,

फिसलन से तुमको गिराता है।

समझती हूँ…..

तुम्हारे टूटे दिल के लिए,

आसान नहीं अपना लेना धब्बों के संग,

जब ख्वाब में श्वेत चुनरी थी,

आसान नहीं अब प्यार भी,

जब कल्पना कोई और थी ।।

© aparnamishra

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दिल से

कलम

मैं….

आज आज़ाद हूँ। कुछ कहने के लिए और चंद सांसें सुकून के लेने के लिए !!

आज़ादी इतना अलग अनुभव देती है, मुझे आज अहसास हुआ….. जब हाथ वही हैं और बोल मेरे ।।

मैं…… मैं एक कलम हूँ (पेन, आजकल प्रयोग होने वाला मेरा नया सा नाम) जो हर वक्त दूसरे की मर्ज़ी या मजबूरी से चलती हूँ ।

मगर आज….. कुछ अलग है !!

आज मैं खुद की खुशी से चल रही हूँ और इस स्वछन्दता से जी रही हूँ । आज अपनी हर भावना को बोल देना चाहती हूँ ….. लेकिन आज लगा कि ये आज़ादी मेरे शब्दों और विचारों को जैसे बांध रही हो, पर मैं मुक्त होना चाहती हूँ….. इस बंधन से ।

आज जिस हाथ ने मुझे थामा है, उसने भी सोचा होगा कि आज शब्दों से हंसी, गम या यूँ ही बीत रहे लम्हों का समावेश किया जायेगा….. कुछ ख्वाब बुने जायेंगें और फिर उन्हीं ख्वाबों को सिरहाने रख कर एक लम्बी खामोश सैर ली जाएगी ।।

ये इन्सान भी अजीब है……

अजीब ये याद आया ये मुझे कहीं रख के भूल भी जाते हैं…. और कभी कभी तो मुझे प्रेम के इज़हार का ज़रिया बना देते हैं। कभी कभी तो गुस्से में मेरी अंगुली (निब) तक मरोड़ दी……. मैं तो बस उन सब के भाव का ज़रिया मात्र रह गयी ।।

मेरा तो दम घुटता है बंद डब्बे में पड़े-पड़े…..

लेकिन तुम, मुझे कहीं रख कर अक्सर भूल ही जाती हो पर मैंने याद रखा तुम्हें अपनी आज़ादी में ।।

तुम्हें पता है ?

मैं भी थक जाती हूँ मेज़ पर लम्बे समय तक लेटे हुए, किताबों के सिरहाने लेटे लेटे कुछ किस्से मुझे भी याद से हो गये हैं । थोड़ी ऊब गयी हूँ…. अपने जैसे कुछ एक दो के साथ खड़े-खड़े ।

तुम्हे पता है कमीज़ की जेब से झांकते वक्त लुका-छुपी का खेल याद आता है लेकिन इस खेल में हम सिर्फ़ छुप कर के रह जाते हैं और जेब से बाहर आने का अवसर तब मिलता है जब हम खेल के बारे में सोच भी ना पायें ।

मैं आज बस अपनी परेशानी बताने के लिए नहीं पुकार रही…. मुझे गर्व है इस बात का कि हर दिल और दिमाग के विचारों की अभिव्यक्ति में मैं सहायक हूँ और शायद मेरी अहम भूमिका भी हैै।

हर एक एहसास के सहारे वर्तमान में होता हुआ भविष्य का सूचक हूँ मैं ।।

कविता

आसमां

देखते तुमको अरसा हुआ,

बड़े उखड़े हुए जला रहे थे,

थोङी छाँव मांगी,

तो धूप बरसा दिया ……

हुआ है क्या

बेचैन यूँ, भटके से है

कुछ तलाश है ?

सदमें में हो ?

दर्द क्या उभरा दिखा ?

अकड़न तोड़ के तुम आज,

मचल के यूँ गिरे हो,

शामें छोड़ के आज,

मुझसे यूँ मिले हो ।

© aparnamishra

Poetry

Shower……a flow

 
Sitting below the shower
with almost no thought
give rise to flow of emotions
from head to toe…..
 
Closed eyes, shrinking body
gives an appearance of foetus
who want to grow,
who want to see the world…..
 
I open my eyes with a tear
stupefied to see light
I am flooded with blood & blisters
but no one around…..
 
As I feel its touch
I turn my head to see it
I open myself to grow
to hold my soul once again….
 
Holding the string of shower
but not rising up
Suddenly I am free
from the compact world….
 
As I am with it
a smile shines with no reason
a purity within is felt
like it washes away the pain….
 
Blisters combine with the flow of eyes
and turn it to a smile
shower is the best place
to live with your true self….
 
Voice turned into a melody
body turns into a gesture
to dance, to sing
and to welcome a new start.   
   
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Happy Doctors Day

Happy Doctors Day

I genuinely express my gratitude to all the Doctors who are selflessly serving & working towards the well being of all in the best possible way.

National Doctor’s Day in India is celebrated on July 1st to honour all the Doctors who serve the people selflessly. The date varies from nation to nation. In India the date is chosen in rememberance of legendary physician Dr.B.C.Roy whose birth date is 1st July.

1991 was the year first time Doctor’s Day was celebrated. This day is observed for their humane services to mankind. It is a day to express gratitude for their services & acknowledge their commitment towards the profession which ultimately brings a healthy nation…..

Thank you all the Doctors.

दिल से

पहली मुलाकात

बात आई यादों की !! यादों में हमारी पहली मुलाकात का जि़कर ना हो ये कैसे होगा भला ।

तुमने पुकारा था, और मैं माँ का हाथ छुृङा के भागी भी थी।

क्या याद है तुमको ?

वो उगता सूरज, अस्सी घाट वाला….जहाँ सीढ़ियों पर बैठ सूरज से पहले एक दूसरे को देखा था। तुमने तो अपनी मीठी मुस्कान से मेरी फूलों वाली फ्रॉक की तारीफ़ भी की थी ।।

और क्या वो याद है तुमको……
जब स्कूल के मैदान में मैं तुम्हारे Cricket के बीचों बीच दौङती हुई खेलने की जि़द् ले कर आयी थी।
तुमने 1 ओवर गेंद फे़क मुझे खेलने भी दिया था।

और साथ में उसी एक ओवर के लिए मिलने का वादा भी किया।
क्या ये याद है आपको – वो बल्ला आपके बाद मैंने ही छुआ था ।।

लगता है शायद वो मुलाकात पहली होगी जब हम दोनों रिश्तों में उलझे-उलझे, आँखें मूंद किसी उदासीन कोने में बैठ एक हाथ में कसा कप लिए ये सोच रहे थे कि – “आखिर कहाँ हो तुम?”

और वहीं खाली कागज़ पर उतरते शब्दों में, मैं तुमसे मिली थी…….. कई, कई बार ।।

और हाँ ! एक नज़र भर कर के, तो तब भी देखा था जब बिखरे टुकङे मैं बुन रही थी।
मुझे याद है…
कुछ टुकङे उठा के तुमने मेरी खाली जगह को, अपने हाथों से भरना चाहा था ।।

नहीं-नहीं….
वो वाली मुलाकात पहली ही थी…..

जब
जब हमने कुछ घंटों में सालों का सफ़र तय किया था।

इस सोशल मीङिया की कमियाँ गिनने के दौर में हमारा तो फ़ायदा ही हो गया था।
हमारी पहली छोटी सी बात जिसने बुनते बुनते आज का दिन बुन ङाला ।

बातें करते करते लंच भी खत्म लेकिन किस्सों ने कॉफी की मांग कर ङाली और हम दोनों इस उम्र के दौर में, खुद में गुम चल दिए कॉफी पीने…..

बस…. काश !! कई साल पहले मिल जाने वाली बात की सोच में ङूबे हुए, सारी बात जैसे आज ही खत्म करने का मन बनाया हुआ हो ।।

आज बैठे बैठे ख्यालों में ख्याल ये आया की आखिर हम पहली बार कब और कैसे मिले थे ????
क्या कहीं किसी जगह खाने साथ किस्से बांटें थे या कॉफी के झाग के साथ सपने बुने थे ?

मुलाकातें याद हैं लेकिन “पहली” किसको कहूँ ?

या इन्तज़ार करूँ

उस पहली ढलती शाम का जब बालकनी में मैं और तुम, हाथ में कसा कप लिए बादलों से टूटती बूंदों को महसूसते हो, कानों में दूर से पुराने गानों की छनती आवाज़ को गुनगुनाते हों……
और
ठहरी हुई हो तुम्हारी आँखें मेरे बालों में छिपे लाल रंग पर, जो चुप चाप मेरी नम सी आँखों से होते हुए मेरी मुस्कान तक आती है ।।

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Let’s Begin

A Dentist by profession, enjoys roaming around with words and seeing story everywhere.

Came here after 5 years of hollow gap to explode words to shower on us with feelings, ongoing stuff and a bit related to health too….  अब डेंटिस्ट हैं तो कुछ तो स्वास्थ सम्बंधित भी लिखना बनता है |

Apart from English, हिंदी भी होगी….. कविता के साथ कहानी भी, कभी यूँही इधर उधर से गुजरते किस्से भी जिन्हें हम देख के भी देखना भूल जाते है।

Ready to learn to dive in words again to breath life as it is….. या कुछ ऐसे जैसे हम सब महसूसते हैं

Advices are always welcome.